मुझे रेगिस्तान मैं एक पानी का चश्मा मिल गया
मुझे रेगिस्तान मैं एक पानी का चश्मा मिल गया
मुझसे ना उम्मीद होने वालो देखो समुन्द्र मिल गया
उड़ ही गया वो परिंदा जिसके पर तुमको ना दिखे
देखो तंज़ देने वालो मुझे एक खजिना मिल गया
बदला वक़्त ऐसा मेरा मुझे हेरात मैं कर दिया
अभी तो रात थी ये ना जाने किसने उजाला कर दिया
अब तो फ़िक्र और बड़ गई ये जाने किसने किया कर दिया
पैदल ही अच्छा था ये दौड़ने वालो मैं क्यों शुमार कर दिया
on January 27th, 2015 at 1:17 am
HI DOSTO
on January 27th, 2015 at 2:04 pm
शहर भर में हमारी 2 ही पहचान हैं।
एक तो आंखे शराबी दूसरा तेवर नवाबी।
MUSTAFA